जब वह 2012 में अपने हाथों में ओलंपिक मशाल लेकर नॉटिंघमशायर की एक सड़क से होकर गुजरीं, तो असम के डिब्रूगढ़ जिले की पिंकी करमाकर ने सोचा होगा कि उनके सपनों की दौड़ अभी शुरू हुई है। तत्कालीन 17 वर्षीया पिंकी लंदन ओलंपिक के उद्घाटन समारोह से लौटी तो एक पदक विजेता का स्वागत करने की तरह उनका स्वागत किया गया था।
केंद्रीय मंत्री और पूर्व सीएम सर्बानंद सोनोवाल, जो उस समय डिब्रूगढ़ के सांसद थे, ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। कारों और मोटरबाइकों के एक काफिले ने जयजयकार करते हुए उनको उस वह चाय बागान तक पहुंचाय, जहां वह रहती थी।
नौ साल और दो ओलंपिक गुजर जाने के बाद, पिंकी - अब 26 साल की- बरबरूवा चाय बागान में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करती है, एक दिन में 167 रुपये कमाती है। वह लड़की जो अपने स्कूल में यूनिसेफ का स्पोर्ट्स फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम चलाती थी और हर शाम लगभग 40 अनपढ़ महिलाओं को पढ़ाती थी, अब वह अपने गरीब परिवार की आजीविका चलाती है। अपने सेवानिवृत्त पिता के अलावा, उसे एक छोटे भाई और दो बहनों की देखभाल करनी पड़ती है।
पिंकी ने कहा, "मेरे बड़े सपने थे, लेकिन अब उम्मीद के लिए कुछ भी नहीं बचा है। अपनी मां की मृत्यु के बाद, मुझे गंभीर आर्थिक तंगी के कारण कॉलेज छोड़ना पड़ा और चाय बागान में मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया।" जब उन्हें लंदन ओलंपिक में मशाल ले जाने के लिए चुना गया था, तब पिंकी कक्षा 10 में थी। उन्हें लंदन 2012 की आधिकारिक विरासत थीम, अंतर्राष्ट्रीय प्रेरणा कार्यक्रम के तहत उनके सामुदायिक कार्य की मान्यता में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया था।
पिंकी जब डिब्रू कॉलेज में बीए कर रही थी, तब उनकी जिंदगी ने एक मोड़ ले लिया। वह इस बात पर अफसोस करती है कि जो लड़की अपने समुदाय की सबसे चर्चित थी, वह अब किसी के लिए भी "महत्वपूर्ण नहीं" है। उन्होंने कहा, "मैं किसी को सलाह नहीं दे सकती। हर कोई मुझसे सवाल करता है कि मैंने जीवन में क्या हासिल किया है। सरकार और यूनिसेफ ने मुझे छोड़ दिया है।"
पिंकी का दावा है कि मशाल रिले में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए उन्हें "पारिश्रमिक" का वादा किया गया था। "आज तक मुझे कुछ नहीं मिला। सच तो यह है कि एक मजदूर की बेटी मजदूर ही रह गई है।"
