राज्य सरकार लवलीना की टोक्यो से घर वापसी से पहले इस सड़क का निर्माण कार्य पूरा करना चाहती है और इसलिए ओवरटाइम भी कर रही है. अभी तक यह सड़क मिट्टी की है जिससे गांव वालों को काफी परेशानी होती है, खासकर बरसात में.
इससे पहले भी इस सड़क को बनाने के प्रयास किए गए थे लेकिन यह काम पूरा नहीं हो सका. अब लवलीना के पदक ने इस काम को अंजाम तक पहुंचाया है. 2016 में असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनेवाल ने यह काम शुरू किया था, लेकिन सिर्फ 100 मीटर रोड ही बनाई गई थी. इस रोड पर 3/9 गोरखा राइफल्स के हवलदार पदम बहादुर श्रेष्ठ का घर भी है जिन्होंने 2019 में पाकिस्तान द्वारा की गई फायरिंग में अपनी जान गंवा दी थी.
गांव वालों ने इस बात की शिकायत की थी कि मिट्टी की सड़क होने के कारण कई बार मरीज को अस्पताल ले जाने में देरी हो जाती है. वहीं एक और अंग्रेजी अखबार द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की मानें तो लवलीना के गांव में पानी की सप्लाई भी नहीं है. यहां पानी ट्यूबवेल या तालाबों से आता है. छोटी से स्वास्थ्य सुविधा के अलावा यहां कोई अस्पताल भी नहीं हैं और इसी कारण गांव के लोगों को गंभीर मरीज को लेकर 45 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है.
गांव वालों को अब अपनी लाड़ली लवलीना का इंतजार है. गांव वाले अब लवलीना को पदक के साथ देखना चाहते हैं और उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वह स्वर्ण पदक जीतकर आएंगी और इससे उनके गांव की स्थिति भी बेहतर होगी. लवलीना ने 69 किलोग्राम भारवर्ग के सेमीफाइनल में जगह बना ली है और इसी के साथ पदक पक्का कर लिया है. अगर वह सेमीफाइनल से भी लौटती हैं तो कांस्य पदक लेकर लौटेंगी और अगर फाइनल में जाती हैं तो रजत या फिर स्वर्ण की संभावना बन जाएगी.
