सिलचर से मदन सिंघल की रिपोर्ट
असम विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में मर्यादित गरिमा और भक्तिभाव के साथ
गीता जयंती समारोह आयोजित किया गया। मार्गशीर्ष मास की मोक्षदा एकादशी के पुण्य
अवसर पर प्रतिवर्ष गीता जयंती मनाई जाती है। इसी पावन तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने
अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश प्रदान किया था।समारोह में विभागाध्यक्ष
प्रो. शांति पोखरेल, प्रो. गोविंद शर्मा तथा अतिथि प्राध्यापक डॉ. कल्लोल राय मुख्य अतिथि के रूप
में उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त संस्कृत विभाग तथा अन्य विभाग के स्नातकोत्तर
प्रथम एवं तृतीय सत्र के विद्यार्थी तथा शोधार्थी में सम्मिलित हुए।कार्यक्रम का
शुभारंभ दीप प्रज्वलन द्वारा किया गया। विभाग की शोधार्थी तानिया पाइन ने गीता
श्लोकों के उच्चारण द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया। तत्पश्चात कार्यक्रम के
उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ. कल्लोल राय ने गीता जयंती के महत्व को रेखांकित
किया।विभागीय शोधार्थिनी विजयालक्ष्मी शर्मा ने गीता के तीन प्रमुख मार्ग कर्म, ज्ञान एवं भक्ति पर विस्तृत चर्चा की। डॉ. विश्वजीत
रूद्र पाल ने गीता के जीवनोपयोगी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए उसके व्यावहारिक
पक्ष को समझाया। स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष के छात्र सौरभ नाथ तथा शोधार्थी अनिमा राय
विश्वास ने भी गीता विषयक अपने विचार प्रस्तुत किए और गीता पाठ की आवश्यकता पर जोर
दिया।विभागाध्यक्ष प्रो. शांति पोखरेल ने कर्मयोग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए
प्रतिदिन गीता पाठ करने की प्रेरणा दी। प्रो. गोविंद शर्मा ने गीता के श्लोक
उदाहरणों के माध्यम से कर्मयोग की श्रेष्ठता को स्पष्ट किया।इसके उपरांत उपस्थित
सभी विद्यार्थियों और शिक्षकों ने मिलकर गीता के सांख्ययोग—द्वितीय अध्याय—का
सामूहिक पाठ किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन तथा शांतिमंत्र के साथ कार्यक्रम का
समापन हुआ।गीता जयंती का यह आयोजन संस्कृत विभाग में आध्यात्मिकता, संस्कृति और ज्ञान की धारा को पुनः प्रवाहित करता हुआ
अत्यंत सफल रहा।
