सिलचर से मदन सिंघल की रिपोर्ट
बराक डेमोक्रेटिक फ्रंट (बीडीएफ) ने पूर्वोत्तर क्षेत्र से एक बंगाली सांसद को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करने की मांग की है।बीडीएफ के मुख्य संयोजक प्रदीप दत्ता रॉय ने प्रेस बयान में कहा कि भाजपा अक्सर बंगाली महापुरुषों का सम्मान और प्रशंसा करती है। प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को देश का पहला प्रधानमंत्री बताया है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भाजपा का उत्साह उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में अक्सर रवींद्रनाथ ठाकुर का उल्लेख करते हैं। लेकिन इसके विपरीत पूर्वोत्तर, विशेषकर असम में बंगालियों की अविकसित स्थिति और सामाजिक-राजनीतिक उपेक्षा पर राज्य एवं केंद्र के नेताओं की चुप्पी रहस्यमय है।उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पूर्वोत्तर से एक बंगाली सांसद को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करने की परंपरा रही है। अरुण कुमार चंद, मुइनुल हक चौधरी, राशिदा हक चौधरी, संतोष मोहन देव, कबिंद्र पुरकायस्थ आदि को पूर्व में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान मिला है। इसका ऐतिहासिक संदर्भ है। बड़ी संख्या में विस्थापित शरणार्थियों के इस क्षेत्र में बसने के समय उनकी समस्याओं के समाधान हेतु केंद्र स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की एक अलिखित सहमति बनी थी। प्रदीप दत्ता रॉय ने कहा कि इसके बावजूद पूर्वोत्तर के बंगालियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ है। पिछले दस वर्षों में इस क्षेत्र से किसी भी बंगाली सांसद को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं मिला है। इसलिए बीडीएफ ने प्रधानमंत्री से इस विषय को प्राथमिकता देने की मांग की है। वर्तमान में बराक घाटी से तीन सांसद हैं और उनमें से किसी एक को तत्काल मंत्रिपरिषद में शामिल करने की मांग की गई है।बीडीएफ मीडिया सेल संयोजक जयदीप भट्टाचार्जी ने कहा कि असम के बंगाली हिंदुओं की स्थिति में भी पिछले दस वर्षों में विशेष सुधार नहीं हुआ है। डी-वोटर की समस्या अब भी बनी हुई है। अनेक मामले ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। एनआरसी से बाहर हुए लगभग छह-सात लाख बंगाली हिंदुओं पर कोई निर्णय नहीं हुआ है। ब्रह्मपुत्र घाटी की जनसंख्या में लगभग 15 प्रतिशत बंगाली हिंदू हैं, फिर भी 111 विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है। इसलिए भाजपा से 10 विधानसभा सीटों पर बंगाली हिंदू उम्मीदवार देने की मांग की गई है।उन्होंने कहा कि बराक घाटी की मुख्य समस्याएं बाढ़, संपर्क व्यवस्था और बेरोजगारी हैं। इन समस्याओं के समाधान में पिछले दशक में संतोषजनक प्रगति नहीं हुई। वैकल्पिक रेललाइन, सड़क संपर्क, हवाई किराया नियंत्रण, उद्योग स्थापना, सरकारी नौकरियों में स्थानीय आरक्षण तथा युवाओं के प्रशिक्षण में कोई ठोस पहल नहीं हुई। चाय उद्योग और कृषि विकास के लिए भी कोई योजनाबद्ध प्रयास नहीं है। बाढ़ रोकथाम हेतु नदी की खुदाई और शहर के नालों के नवीनीकरण जैसे जरूरी कार्य भी नहीं किए गए।उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति से परिणाम मिलना संदिग्ध है। आगामी चुनावों में ये मुद्दे निर्णायक साबित होंगे। इसलिए प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री से इन मुद्दों पर अपना स्पष्ट रुख रखने की मांग की गई है।बीडीएफ के मुख्य संयोजक प्रदीप दत्ता रॉय ने प्रेस बयान में कहा कि भाजपा अक्सर बंगाली महापुरुषों का सम्मान और प्रशंसा करती है। प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को देश का पहला प्रधानमंत्री बताया है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भाजपा का उत्साह उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में अक्सर रवींद्रनाथ ठाकुर का उल्लेख करते हैं। लेकिन इसके विपरीत पूर्वोत्तर, विशेषकर असम में बंगालियों की अविकसित स्थिति और सामाजिक-राजनीतिक उपेक्षा पर राज्य एवं केंद्र के नेताओं की चुप्पी रहस्यमय है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पूर्वोत्तर से एक बंगाली सांसद को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करने की परंपरा रही है। अरुण कुमार चंद, मुइनुल हक चौधरी, राशिदा हक चौधरी, संतोष मोहन देव, कबिंद्र पुरकायस्थ आदि को पूर्व में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान मिला है। इसका ऐतिहासिक संदर्भ है। बड़ी संख्या में विस्थापित शरणार्थियों के इस क्षेत्र में बसने के समय उनकी समस्याओं के समाधान हेतु केंद्र स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की एक अलिखित सहमति बनी थी। प्रदीप दत्ता रॉय ने कहा कि इसके बावजूद पूर्वोत्तर के बंगालियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ है। पिछले दस वर्षों में इस क्षेत्र से किसी भी बंगाली सांसद को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं मिला है। इसलिए बीडीएफ ने प्रधानमंत्री से इस विषय को प्राथमिकता देने की मांग की है। वर्तमान में बराक घाटी से तीन सांसद हैं और उनमें से किसी एक को तत्काल मंत्रिपरिषद में शामिल करने की मांग की गई है।बीडीएफ मीडिया सेल संयोजक जयदीप भट्टाचार्जी ने कहा कि असम के बंगाली हिंदुओं की स्थिति में भी पिछले दस वर्षों में विशेष सुधार नहीं हुआ है। डी-वोटर की समस्या अब भी बनी हुई है। अनेक मामले ट्रिब्यूनल में लंबित हैं। एनआरसी से बाहर हुए लगभग छह-सात लाख बंगाली हिंदुओं पर कोई निर्णय नहीं हुआ है। ब्रह्मपुत्र घाटी की जनसंख्या में लगभग 15 प्रतिशत बंगाली हिंदू हैं, फिर भी 111 विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है। इसलिए भाजपा से 10 विधानसभा सीटों पर बंगाली हिंदू उम्मीदवार देने की मांग की गई है।उन्होंने कहा कि बराक घाटी की मुख्य समस्याएं बाढ़, संपर्क व्यवस्था और बेरोजगारी हैं। इन समस्याओं के समाधान में पिछले दशक में संतोषजनक प्रगति नहीं हुई। वैकल्पिक रेललाइन, सड़क संपर्क, हवाई किराया नियंत्रण, उद्योग स्थापना, सरकारी नौकरियों में स्थानीय आरक्षण तथा युवाओं के प्रशिक्षण में कोई ठोस पहल नहीं हुई। चाय उद्योग और कृषि विकास के लिए भी कोई योजनाबद्ध प्रयास नहीं है। बाढ़ रोकथाम हेतु नदी की खुदाई और शहर के नालों के नवीनीकरण जैसे जरूरी कार्य भी नहीं किए गए।उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति से परिणाम मिलना संदिग्ध है। आगामी चुनावों में ये मुद्दे निर्णायक साबित होंगे। इसलिए प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री से इन मुद्दों पर अपना स्पष्ट रुख रखने की मांग की गई है।
