असम में बिछ चुकी है विधानसभा चुनाव की बिसात


 

निर्वाचन आयोग द्वारा 2026 के असम विधानसभा चुनावों के लिए अप्रैल को मतदान तिथि घोषित किए जाने के साथ ही राज्य में कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे चुनावी विमर्श पर हावी होने के लिए तैयार हैंजो मतदान से पहले प्रमुख दलों की चुनावी रणनीतियों को आकार देंगे। इन मुद्दों में घुसपैठबेदखली अभियानबाल विवाह के खिलाफ कार्रवाईविकास परियोजनाएं और कल्याणकारी योजनाएंसाथ ही राज्य के सांस्कृतिक प्रतीक जुबिन  गर्ग की मृत्यु से जुड़ा विवाद शामिल है। सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष—दोनों ही अपने-अपने नैरेटिव को धार देने की तैयारी में हैं।

राज्य के सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक घुसपैठ का मसला है। यह बहस असम आंदोलन और उसके बाद हुए असम समझौते से जुड़ी हैजिसका उद्देश्य अवैध प्रवासन को लेकर चिंताओं का समाधान करना था। भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार का कहना है कि उसने समझौते के प्रावधानों को लागू करने के लिए कदम उठाए हैं। वहीं विपक्ष का तर्क है कि मूल  असमिया लोगों की सांस्कृतिकसामाजिक और भाषाई पहचान की रक्षा के लिए वादा किए गए संवैधानिकविधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय अब तक पूरे नहीं हुए हैं।

विपक्ष कथित अवैध प्रवासियों के खिलाफ सरकार की कार्रवाई पर भी सवाल उठाने की तैयारी में है। उसका आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा “पुशबैक” अभियानों के दौरानजिनमें बांग्लादेश से आए संदिग्ध प्रवासी शामिल होते हैंवास्तविक भारतीय नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। यह मुद्दा विशेष रूप से मुस्लिम-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में प्रमुखता से उठने की संभावना हैजहां कांग्रेस और उसके सहयोगी कथित उत्पीड़न के मुद्दे को उजागर करने की योजना बना रहे हैं।

प्रवासन बहस से जुड़े राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसीऔर नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएएभी चुनावी बयानबाजी में प्रमुख रहेंगे। भाजपा का कहना है कि सीएए का विरोध गलत था और वह इस बात पर जोर देती है कि इस कानून के तहत बांग्लादेश से आए बहुत कम हिंदुओं ने ही नागरिकता के लिए आवेदन किया है। वहीं विपक्षी दल इस कानून और एनआरसी  प्रक्रिया के संचालन की लगातार आलोचना कर रहे हैं।

राज्य सरकार द्वारा चलाए गए बेदखली अभियान भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बने रहेंगे। सत्तारूढ़ गठबंधन का दावा है कि इन कार्रवाइयों के जरिए वन भूमिसत्र भूमिमंदिर भूमि और अन्य सरकारी संपत्तियों को अवैध कब्जे से मुक्त कराया गया है। दूसरी ओरविपक्ष इन अभियानों को मानवीय संकट करार देता है और दावा करता है कि बेदखली के बाद कई परिवारों ने अपने घर और आजीविका खो दी है।

बाल विवाह के खिलाफ सरकार की कार्रवाई भी चुनावी विमर्श को प्रभावित करने वाला एक अहम मुद्दा होगी। प्रशासन ने ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (पोस्कोएक्ट’ सहित विभिन्न कानूनों के तहत कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है। सत्तारूढ़ गठबंधन इसे एक लंबे समय से चली आ रही सामाजिक समस्या से निपटने का प्रयास बताता हैजबकि विपक्ष का आरोप है कि इस अभियान का असंतुलित असर मुस्लिम समुदाय पर पड़ा है।

विकास और कल्याणकारी योजनाएं भी चुनावी प्रचार का अहम हिस्सा रहेंगी। राज्य सरकार नई सड़कोंरेलवे विस्तारहवाई अड्डों और जलमार्गों जैसे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के साथ-साथ प्रस्तावित टाटा सेमीकंडक्टर इकाई और ‘एडवांटेज असम’ व्यापार सम्मेलन के दौरान हुए निवेश समझौतों को प्रमुखता से पेश कर सकती है। विपक्ष का कहना है कि विकास असमान रहा है और कुछ परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से स्थानीय समुदाय प्रभावित हुए हैं।

महिला मतदाताओं के लिए लक्षित कल्याणकारी योजनाएं भी प्रमुखता से सामने आएंगी। सरकार महिलाओं को प्रति माह 1,250 रुपये की वित्तीय सहायतामहिला उद्यमियों के लिए समर्थन और स्वास्थ्य लाभ जैसी पहलों को रेखांकित करेगी। वहीं विपक्ष का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध अभी भी चिंता का विषय हैं और कल्याणकारी लाभों का वितरण समान रूप से नहीं हुआ है।

रोजगार सृजन भी सत्तारूढ़ गठबंधन के अभियान का हिस्सा होगा। सरकार विभिन्न विभागों में 1.6 लाख से अधिक युवाओं की नियुक्ति को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी। भाजपा चाय बागान श्रमिकों के लिए कल्याणकारी उपायों पर भी जोर दे सकती हैजो एक बड़ा मतदाता वर्ग है और हाल के चुनावों में कांग्रेस से भाजपा की ओर झुका है।

सितंबर 2025 में सिंगापुर में गायक जुबिन गर्ग की मृत्यु का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। विपक्षी दलों का आरोप है कि राज्य सरकार ने न्याय सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कठोर कदम नहीं उठाए। वहीं सरकार का कहना है कि एक विशेष जांच दल का गठन किया गयाआरोपियों को गिरफ्तार किया गया और मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है।

126 सदस्यीय असम विधानसभा में वर्तमान में भाजपा के 64 विधायक हैं। उसके सहयोगी—असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरलके क्रमशः नौ और सात विधायक हैंजबकि बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के पास तीन सीटें हैं। विपक्ष में कांग्रेस के 26 विधायकऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट  के 15 विधायक हैंजबकि माकपा और एक निर्दलीय के पास एक-एक सीट है।

असम आज एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। लगभग एक दशक के भाजपा शासन के बाद पूरे राज्य में असंतोष दिखाई दे रहा है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैंयुवाओं में बेरोजगारी बहुत अधिक बनी हुई है और किसानमजदूर तथा छोटे व्यापारी बढ़ते आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। इन बुनियादी समस्याओं का समाधान करने के बजायभाजपा-नेतृत्व वाली सरकार ने अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए विभाजनकारी राजनीतिसांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सत्तावादी रवैये पर अधिक निर्भरता दिखाई है।

घृणा और ध्रुवीकरण की राजनीति वर्तमान शासन की एक प्रमुख विशेषता बन गई है। बार-बार दिए जाने वाले भड़काऊ बयान और समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के प्रयासों ने राज्य के सामाजिक माहौल को दूषित कर दिया है। उल्लेखनीय है कि 26 फरवरी को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा को नोटिस जारी करते हुए राज्य सरकार को उन याचिकाओं पर जवाब देने का निर्देश दियाजिनमें उन पर पूर्वी बंगाल मूल के मुसलमानोंजिन्हें ‘मियां’ कहा जाता हैके खिलाफ कथित घृणास्पद भाषण देने का आरोप लगाया गया है। ये याचिकाएं माकपा और भाकपा की असम राज्य इकाइयों द्वारा तथा अलग से प्रख्यात बुद्धिजीवी डॉ. हीरेन गोहाईं और दो अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर की गई थीं। इस घटनाक्रम ने असम में राजनीतिक विमर्श के बढ़ते सांप्रदायिकीकरण को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा की हैं।

राज्य के विभिन्न हिस्सों में बिना उचित पुनर्वास के चलाए गए बेदखली अभियानों की श्रृंखला भी उतनी ही चिंताजनक रही है। कई क्षेत्रों में पूर्वी बंगाल मूल के मुसलमानों और स्थानीय निवासियों ने इन कार्रवाइयों का सबसे अधिक खामियाजा भुगता है। समाज के ये गरीब और हाशिए पर रहने वाले वर्ग अपनी जमीनघर और आजीविका खो रहे हैं।

इसी दौरान भाजपा सरकार ने कॉरपोरेट समर्थक आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाया है। विकास के नाम पर बड़ी मात्रा में भूमि—बताया जाता है कि लगभग पचास हजार बीघा—अडानीअंबानी और रामदेव से जुड़ी कंपनियों जैसे कॉरपोरेट समूहों को सौंपी गई हैअक्सर भूमिहीन ‘मियां’ और ‘स्थानीय’ समुदायों को बेदखल करने के बाद।

सरकार के बहुप्रचारित विकास मॉडल की पर्यावरणीय कीमत भी भारी रही है। एक आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसारमई 2016 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से असम में 1,06,896 परिपक्व पेड़ काटे गए हैं। हाल के वर्षों में इस विनाश की गति और तेज हो गई है। 2021 से 2025 के बीचमुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के कार्यकाल में 65,000 से अधिक पेड़ काटे गएजबकि इससे पहले सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान यह संख्या लगभग 18,000 थी।

चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण  में असम के लगभग 2.52 करोड़ मतदाताओं को शामिल किया गया था। फरवरी 2026 में प्रकाशित अंतिम सूची में लगभग 2.49 करोड़ मतदाता दर्ज किए गएजिससे पता चलता है कि इस प्रक्रिया में लगभग 2.4 लाख नाम हटा दिए गए।

हालांकि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित प्रक्रिया हैलेकिन नागरिकता विवादों के लंबे और संवेदनशील इतिहास वाले राज्य में इस तरह का बड़े पैमाने पर सत्यापन आम मतदाताओं के बीच चिंता पैदा करता है। इन चिंताओं को 2023 में निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए विधानसभा और लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के विवादास्पद परिसीमन से भी बल मिला हैजिसे कई राजनीतिक दलों और पर्यवेक्षकों ने सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में असमान रूप से झुका हुआ बताया है। इस प्रक्रिया की आलोचना इसलिए भी हुई कि इसमें विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों द्वारा उठाई गई आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया।

इस बीचसत्तारूढ़ दल ने चुनावों से पहले लोकलुभावन योजनाओं का विस्तार किया है। ओरुनोदई योजना-3.0 को लगभग 40 लाख लाभार्थियों तक बढ़ाया गया और 10 मार्च कोचुनाव की घोषणा से ठीक पहले, 3,800 करोड़ रुपये वितरित किए गए। कल्याणकारी और राहत उपाय आवश्यक हैंलेकिन इनके विस्तार का समय और तरीका इस बात को लेकर उचित सवाल उठाता है कि कहीं इनका उपयोग चुनावी प्रलोभन के रूप में तो नहीं किया जा रहा हैखासकर तब जब असम सरकार का कर्ज बोझ लगातार चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है।